THINK. ACT. CHANGE.

Artharth

- anshuman tiwari

बेचैनी की जड़समर्थन मूल्य में रिकॉर्ड बढ़ोतरी, किसानों की कर्ज माफी, खेती की ढेर सारी स्कीमें! फिर भी तीन महीने में दूसरी बार किसान दिल्ली में आ जुटे. ताजा चुनावों [...]

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विरासतों की कारसेवापुरी में जगन्नाथ मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश और निकास दरवाजों के पास मरीजों को ले जाने वाले स्ट्रेचर रखे देखकर अचरज होना लाजिमी है. लेकिन अगर किसी भी [...]

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आगे ढलान है  !पिछले चार साल में मेक इन इंडिया के जरिए उद्योग के सरदारों को रिझा रही सरकार को अचानक बेचारे बेबस और नोटबंदी-जीएसटी के मारे छोटे उद्योग क्यों याद आ गए, [...]

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तरीकों का तकाजाबीते हफ्ते सिंगापुर में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनिया की वित्तीय तकनीकी (फिनटेक) कंपनियों को भारत में आने का न्योता दे रहे थे तब भारत में मोबाइल [...]

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उन्नीस के बादअगर हम सियासत के गुबार से बाहर देख पाएं तो हमें कर्ज संकट से निबटने की तैयारी शुरु कर देनी चाहिए जो करीब दस-बारह महीने के बाद भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था पर [...]

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अच्‍छे दिन ‘दिखाने’ की कल...

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पिछले दो-तीन वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था सचमुच गहरी मंदी का शिकार थी या हमारी पैमाइश ही गलत थी? अथवा नई सरकार ने सत्ता में आने के बाद पैमाइश का तरीका बदल दिया ताकि तस्वीर को बेहतर दिखाया जा सके? गनीमत है कि भारत में आम लोग आंकड़ों को नहीं समझते. राजनीति में कुछ भी कह कर बच निकलना संभव है और झूठ व सच को आंकड़ों में कसना टीवी बहसों का हिस्स [...]

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