THINK. ACT. CHANGE.

Artharth

- anshuman tiwari

जो नहीं जानते ख़ता क्या हैजो पीडि़त हैं वही क्यों पिटते हैं?काली कमाई और भ्रष्टाचार पर गुर्राई नोटबंदी अंतत: उन्हीं पर क्यों टूट पड़ी जो कालिख और लूट के सबसे बड़े शिकार हैं.जवा [...]

- anshuman tiwari

ताकि, सनद रहे !गलत सिद्ध होने का संतोष,  कभी कभी, सही साबित होने से ज्यादा कीमती होता है. सरकारी फैसलों पर  सवाल उठाना और आगाह करना कोई क्रांति नहीं है. यह तो पत्रका [...]

- anshuman tiwari

नोटबंदी का तिलिस्मी  खाताचलिए, काला धन तलाशने में सरकार की मदद करते हैं. नोटबंदी को गुजरे एक साल गुजर गया. कोई बड़ी फतह हाथ नहीं लगी. ले-देकर गरीब कल्याण योजना में आए 5,000 कर [...]

- anshuman tiwari

याद हो के न याद होराजनेताओं की सबसे बड़ी सुविधा खत्म हो रही है. लोगों की सामूहिक विस्मृति का इलाज जो मिल गया है.जॉर्ज ऑरवेल (1984) ने लिखा था कि अतीत मिट गया है, मिटाने [...]

- anshuman tiwari

जीएसटी के उखडऩे की जड़चुनावों में भव्‍य जीत जमीन से जुड़े होने की गारंटी नहीं है. यह बात किसी उलटबांसी जैसी लगती है लेकिन यही तो जीएसटी है.जीएसटी की खोट, नाकामी और किरकिरी इ [...]

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अच्‍छे दिन ‘दिखाने’ की कल...

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पिछले दो-तीन वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था सचमुच गहरी मंदी का शिकार थी या हमारी पैमाइश ही गलत थी? अथवा नई सरकार ने सत्ता में आने के बाद पैमाइश का तरीका बदल दिया ताकि तस्वीर को बेहतर दिखाया जा सके? गनीमत है कि भारत में आम लोग आंकड़ों को नहीं समझते. राजनीति में कुछ भी कह कर बच निकलना संभव है और झूठ व सच को आंकड़ों में कसना टीवी बहसों का हिस्स [...]

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